चूक गये कमलनाथ

चूक गये कमलनाथ


        .        कृष्णदेव (केड़ी) सिंह
भोपाल २9मार्च20020.राजनीति में कब क्या हो जावे,कहना बहुत कठिन है लेकिन कमलनाथ और उनके सिपहसलारों की कार्यप़णाली और सिंधिया घराने से उनकी बढ़ती दुरी को देखकर मध्यप्रदेश की राजनीति और समाजनीति के जानकरों ने कहना शुरू कर दिया था कि पुत के पांव पालने में हीदिख गया है। और  वही ड्हुआ।कमलनाथ ने  ऐसा काम नहीं किया किजिससे  उनकी सरकार के गिरने से जनता दुखी हो।बल्कि पिछले तीन दसक से अधिक समय से मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में रहकर राजनीति व सत्ता का खेल कोमुक्षे भी देखने और समक्षने का अवसर मिला है।झ्स दौरान यह दुसरा अवसर था जब कांग्रेस कार्यक्ताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग सरकार जाने का खुशी मना रहा था।हलांकि उन्हें ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में जाने का मलाल तो था ।वैसे भी चुनावी वादों को पूरा करने में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की   सरकार जनता से किये गये वादों को पुरा करने में पूरी तरह नाकाम रही.अब जब 22 विधायकों के इस्तीफे से और दो की मृत्यू हो जाने से रिक्त कुल 24 जो सीटें खाली हुई हैं, वहां होने वाले उपचुनावों में कांग्रेस मजबूत स्थिति में नहीं दिख रही है। कांग्रेस के पूर्व महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा की सदस्यता ग़हण करने और उनके समर्थक 22 विधायकों के विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा देने के बाद मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार  गिर  गयी. कमलनाथ सरकार के गिरने के बाद शिवराज सिंह चौहान ने चौथी बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ  ली है।और इस प्रकार उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, कर्नाटक के बाद मध्य प्रदेशमें भी  सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के विधायकों का इस्तीफ़ा दिलाकर ,भाजपा ने अपनी सरकार बना ली. अब  विधायकों के इस्तीफ़े से रिक्त होने वाली सीटों पर आने वाले उपचुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों को अच्छा प्रदर्शन की आशा है ।हलांकि कमलनाथ ने  इस्तीफ़ा देते समय इस  तरफ़ इशारा किया था कि आने वाले उपचुनाव में उनको सरकार की वापसी की  उम्मीदें हैं। लेकिन इस बात की  कम सम्भावना है कि कांग्रेस पार्टी खाली कुल24सीटों पर होने वाले उपचुनाव में सानदार  वापसी कर पाएगी?
             ऐस़ा नही हो पाने के कई कारण है। जिसमें सिंधिया घराने की प्रभाव वाले क्षेत्र के साथ - साथ कांग्रेस पार्टी में प्रतिवद्ध कार्यकताओं की कमी प्रमुख है।ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योकि, कांग्रेस कैडर आधरित पार्टी नहीं है. इसलिए उसके नेता जब पार्टी से चले जाते हैं तो अपने समर्थकों को भी साथ लेकर जाते हैं. उसके विधायकों को लगता है कि भाजपा में शामिल हो जाने पर भी  उनके समर्थक साथ बने रहेंगे. मध्य प्रदेश मे थी  कांग्रेस पार्टी  क्षेत्रीय दिग्गज नेताओं के अपने क्षेत्र की जनता के साथ बने सम्पर्क ब सम्बन्ध की वजह से चलती है, इसलिए जब बड़े नेता के पार्टी छोड़कर जाते हैं तो सामान्यतः कांग्रेस उस क्षेत्र में कमजोर हो जाती है।मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार का  लचर प्रदर्शन भी उसे उपचुनाव में सफलता दिलाने में आड़े आ सकता है क्योंकि अपने समय में कमलनाथ  शासन का कोई छाप नहीं छोड़ पाए। मध्यप्रदेश विधानसभा में कांग्रेस ने शिवराज सरकार के समय हुए व्यापाम घोटाले, मंदसौर में किसानों पर हुई गोलीबारी, दलितों पर हुए फ़र्ज़ी मुक़दमे, पिछड़े वर्गों की लगातार हो रही उपेक्षा आदि को मुद्दा बनाकर चुनाव जीता ना था। जीत के बाद कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच मुख्यमंत्री पद के लिए रस्साकशी हुई थी, जिसमें दिग्विजय सिंह की मदद से  और अपनी पकड़ की बदौलत कमलनाथ बाज़ी मार ले गए थे.।कुल मिलाकर पिछले एक साल से ज़्यादा समय से कमलनाथ मुख्यमंत्री रहे, इसलिए ज़रूरी हो गया है कि विधानसभा चुनाव के दौरान किए वादों का उन्होंने सरकार बनने पर क्या किया?


        विधानसभा चुनाव के दौरान व्यापम यानी सरकारी नौकरी में भर्ती घोटाला एक अहम मुद्दा था, जिस पर कांग्रेस ने सरकार बनने पर कार्रवाई का भरोसा दिया था।  यह  राज्य सरकार की नौकरियों में होने वाले भ्रष्टाचार से जुड़ा था, इसलिए चुनाव में मध्यवर्ग और युवाओं का  समर्थन कांग्रेस को मिला था।परंतु सरकार बनने के बाद इस मामले में कुछ भी नहीं हुआ और न ही किसी की इस मामले में गिरफ़्तारी नहीं हुई। व्यापम के अलावा भी रेत काण्ड जैसे तमाम घोटाले निकलकर आए, लेकिन कमलनाथ सरकार किसी भी मामले में कार्यवाही करते नहीं दिखी।राज्य के लोकसेवा आयोग से लेकर तमाम संस्थाओं को कमलनाथ पुराने तंत्र के साथ ही चलाते रहे।इससे गलत संदेश जनता में गई व कमलनाथ की छवि खराब हुई।उन्हें लोग नेता के बजाय प्रबन्धक समक्षने लगे।मंदसौर ज़िले में किसानों पर हुई गोलीबारी के बाद किसानों का मुद्दा चुनावी राजनीति का प्रमुख मुद्दा बन गया था. कांग्रेस ने तब इस मुद्दे को लपकते हुए, इसके दोषी लोगों पर कार्रवाई करने का वादा किया था. मध्य प्रदेश में कांग्रेस का चुनाव प्रचार अभियान मंदसौर से ही शुरू हुआ था, जिसमें राहुल गांधी भी शामिल हुए थे।परन्तु कमलनाथ यही कहते रह गए कि सख्त कार्रवाई होगी पर हुआ पर हुआकुछ नहीं।कांग्रेस ने चुनाव प्रचार के दौरान किसानों की क़र्ज़ माफ़ी का भी वादा किया था। सरकार बनने के बाद किसानों की क़र्ज़माफ़ी ठीक ढंग से नहीं लागू हुई। राज्य की ख़राब वित्तीय हालत का हवाला देकर कमलनाथ ने अपने इस वादे को पूरा करने में किन्तु-परन्तु  की।जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस मामले को लेकर सड़क पर उतरने की धमकी दी, तो कमलनाथ ने जवाब दिया  कि ‘उतर जाएं‘।कमलनाथ के इसी अहंकारपूर्ण उत्तर ने उन्हें अंहकारी सिद्ध कर दिया और जवाव में ज्योंतिरादित्य ने कमलनाथ और दिग्गी राजाके सारे अरमान और अहंकार को चुर - चुर कर किया।लेकिनदोनो के लिए संतोषजनक स्थिति बन गई कि वे.सिंधिया को काग्रेस पार्टी से बाहर निकालने में सफल जरूर हो गये। 
         विधानसभा चुनाव में चंबल-ग्वालियर संभाग में कांग्रेस पार्टी को अच्छी सफलता मिली थी तथा विन्ध्य क्षेत्र के प्रमुख नेता  अजयसिंह राहुल को रणनीति के तहत निपटाने में सफलता प्राप्त किया गया था।झ्स चक्कर में विन्ध्य से कांग्रेस ही निपट गई।खैर।चंबल-ग्वालियर क्षेत्र से ज़्यादा सीटें आने की एक कारण यह है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया का यह क्षेत्र माना जाता है और विधानसभा चुनाव के समय उन्होंने इस क्षेत्र में जमकर मेहनत की थी।उन्होंनेसबसे ज्यादा सभायें की थी क्योंकि उन्हें लगता था कि वेबहुमत आने पर मुख्यमंत्री बनेगें।दूसरी यह  कि दो अप्रैल, 2017 एससी-एसटी एक्ट को बचाने के लिए हुए भारत बंद के दौरान  भाजपा सरकार ने  इस क्षेत्र से बहुत बड़ी संख्या में दलितों पर फ़र्ज़ी मुक़दमे दर्ज करवाये थे। कांग्रेस पार्टी ने चुनाव में फ़र्ज़ी मुक़दमों को वापस करने का वादा किया था।  इस कारण क्षेत्र के दलित मतदाताओं ने बसपा को छोड़कर, कांग्रेस के पक्ष में रणनीतिक वोटिंग की।लेकिन सरकार बनने के एक साल बाद भी दलित कार्यकर्ताओं पर मुकदमे न वापस हुये और न हीं इसदिशा मे को३ि पहल हुई। कांग्रेस से बग़ावत करने वाले ज़्यादातर विधायक इसी क्षेत्र से हैं।ज्ञात०य हो कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश ऐसे राज्य हैं जहां भाजपा पूर्व की जनता पार्टी की राख पर खड़ी है।इसी वजह से इन राज्यों में भाजपा को ओबीसी ( अन्य पिछड़ा वर्ग) के एक बहुत बडे वर्ग का वोट मिलता है।मध्य प्रदेश में बीजेपी ने अपने पिछले तीनों मुख्यमंत्री- उमा भारती (लोध), बाबूलाल गौर (यादव) और शिवराज सिंह चौहान (किरार) पिछड़े वर्ग से ही बनाए, जिससे ओबीसी ( अन्य पिछड़ा वर्ग)का वोट पार्टी को बड़ी संख्या में मिलता है। कांग्रेस ने भाजपा से इस समुदाय का वोट खींचने के लिए राज्य सरकार की नौकरियों में ओबीसी आरक्षण प्रतिशत को बढ़ाने का वादा किया था.लेकिन किया कुछ नहीं।
लोकसभा चुनाव के पहले एक सरकारी आदेश जारी करके ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत करने की कोशिश भी की गई. लेकिन ये मामला हाईकोर्ट में फंस गया लेकिन न्यायलय में इसे अपने हाल पर छोड़ किया।इससे कमलनाथ की भी मंशापर ही प्रश्नचिन्ह लग गये।क्योंकि ओबीसी के हितों को लेकर कमलनाथ और कांग्रेस इस मामले पर कतई गंभीर नहीं दिखी।कांग्रेस कभी दम ठोककर यह भी नहीं कह पाई कि उसने ओबीसी का आरक्षण बढ़ा दिया है।कमलनाथ सरकार.इस मामले में दिखावे की राजनीति करती नजर आई।इस तरह उसे न तो सवर्णों का समर्थन मिला और न ही ओबीसी का और इसका सर्वाघिक राजनीतिक और सामाजिक नुकसान कांग्रेस पार्टी और व्याक्तिगत रन्पसे कमलनाथ को भुगतना पड़ेगा।इन नेताओं की दिक्कत  यह है कि वे सभी मनुवादी और दलाल प्रवृतिवालों नेताओं और समर्थको से घिरे रहते ह्रै व वे अब भी इंन्दिरा गाँधी के जमाने में जी रहे है।खैर।कमलनाथ ने मध्य प्रदेश के विभिन्न निगमों, आयोगों आदि में भी नियुक्तियां नहीं की। अगर वे ये काम कर पाते तो इससे उनकी पार्टी के विधायकों में असंतोष की सम्भावना कम हो पाती. मध्य प्रदेश जैसे राज्य में, जहां कांग्रेस कई गुटों में बटीं है, सभी खेमे के विधायकों को पद देना ज़रूरी हो जाता है. पहले भी सरकारें ये करती रही हैं।लेकिन कांग्रेस इस काम में भी चूक गयी।सरकार का जाना जब तय हो गया तब आनन फानन में जिनलोगों को नियुक्त किया उससे पार्टी के प्रति समपित लोगों की नाराजगी और बढ़ा दी है ।कुल मिलाकर प्रदेश में कांग्रेस और उसके दिग्गजो की स्थिति हास्मास्पद हो ग्ई और उनकी हालत माया मिली न राम की हो गई है?
*बुघवार बहुमाध्यम समूह