बड़ा सा गाँव मेरा

बड़ा सा गाँव मेरा,
 भरा पुरा बाजार था!
 नाई, मोची, सुनार,बङई,तेली,कहार,
हलवाई,दर्जी व मीना बाजार था।।


छोटे ,मक्षले और बडे घर भी थे 
और हर आदमी बङा दिलदार था।


कहीं भी ,कभी भी रोटी खा लेते थे,
मेरे लिए हर घर मे भोजऩ तैयार था ।।


क्षिगुनी,सतपुतिया की सब्जी मजे से खाते थे
 आलू व परबल के आगे शाही पनीर बेकार था ।


तव ना कोई मैगी ना पिज़्ज़ा,ना बरगर था,
तिलोरी ,दनौरी भुजिया, मिठकी औ खटकी अचार था।।


 निम्बोली,पक्कल गुल्लड़ और बेरिया सदाबहार था.
बगौचा के आमा और फुलवारी में अमस्न्द का बहार था।
रसोई के परात या घड़े को बजा लेते,
चौकी पर नीटू पूरा संगीतकार था.।।


मुल्तानी माटी लगा नदिया में डुबकी लगा लेते,
मिठकी कुआं के सामने स्विमिंग पूल सब  बेकार था ।


और फिर शाम को कबड्डी खेल लेते,
तव.हमें कहाँ क्रिकेट का खुमार था.।।


मजुरवा  से रात को खिस्सा -कहानी सुन लेते,
तब कहाँ टेलीविज़न और अखबार था ।


भाई-भाई से औ गोतिया से सब खुश था,
गाँव के सभी लोगों मे प्यार और विश्वास था ।।


मेरा बड़ा सा गाँव पूरा बिग बाजार था.
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Krishan Deo singh