मध्यप्रदेश की राजनीति में जबरदस्त उठापटक

मध्यप्रदेश की राजनीति में जबरदस्त उठापटक



                       कृब्णदेव (केडी) सिंह
  .      भोपाल।     देश के पैमाने पर खबरों में मामले में अमूमन नीरस माने जाने वाले मध्यप्रदेश में होली के दिन ब्रेकिंग खबरों की ऐसी रसवर्षा हुई कि चैनलोंं के प्राइम टाइम से पूरे दिन करोना वायरस, सीएए, दंगे गधे की सींग की तरह गायब रहे।इससे पहले यहां की राजनीति में ऐसा मौका 1967 में आया था जब श्रीमती विजयाराजे सिंधिया ने द्वारिका प्रसाद मिश्र के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को  गिरा दिया था और फिर गोविंदनारायण सिंह के नेतृत्व में प्रदेश में संयुक्त विधायक दल(संविद) की सरकार बनी।लेकिन  घटनाएं राजनीति के इतिहास की किताबों में दर्ज हैं। देश के इतिहास में बागी विधायकों ने पहली दफे राजनीतिक पर्यटन का सुख भोगा था। विधायकों को लामबंद करके राजधानी से दूर भेजने का यह पहला राजनीतिक प्रयोग था.जो इतना फलाफूला कि अब यह सरकार धँसाने का अमोघास्त्र बन गया।


1995 में भी ऐसी ही एक घटना घटी।  अयोध्या कांड के बाद वहां केशूभाई पटेल के नेतृत्व में गुजरात में भाजपा सरकार बनी। नरेन्द्र भाई मोदी तब गुजरात प्रदेश के संगठन मंत्री थे।  हुआ यह कि भाजपा के कद्दावर शंकर सिंह वाघेला ने विद्रोह कर दिया। वह 27 सितंबर का दिन था जब वाघेला 47 विधायकों को लेकर खजुराहो पहुँच गए। मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार थी। जाहिर है वाघेला ने तब कांग्रेस की शरण ली थी। केंद्र में नरसिंहराव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी। खजुराहो में बागी विधायकों की मेहमाननवाजी और सुरक्षा दिग्विजय सिंह के हाथों थी। भाजपा को उस संकट से अटलबिहारी वाजपेयी, भैरोंसिंह शेखावत और कुशाभाऊ ठाकरे ने बड़ी कुशलता से निकाला। केशूभाई की कुर्सी पर सुरेश मेहता को बैठाया और वाघेला की जायज-नाजायज मांगें मानने के बाद वहाँ की सरकार बची और बाद में उसकी बागडोर नरेन्द्र मोदी ने सँभाला और शंकर सिंह वाघेला कांग्रेस में जा मिले।
         इस घटना के वक्त  मैं दैनिक अग्रदूत  में विशेष संवाददाता था।अपने लिए यह लगभग वैसे ही था जैसे कि रविशकर विश्वविद्यालय रायपुर का छात्रसंघ का चुनाव हो।मैं भी छात्र राजनीति से होकर पत्रकारिता में आया था सो उन विधायकों के ठाटबाट, मौजमस्ती देखने करने लायक थी। तब खजुराहो में दिल्ली के पत्रकारों का अच्छा खासा जमावड़ा था। खबरों के लिए फैक्स या लैंडलाइन फ़ोन थे।खजूरिया शब्द यहीं से निकला। केशूभाई सरकार से बगावत कर जो खजुराहो में आ टिके वे खजूरिया कहलाए और जो सरकार के साथ वफादारी से रहे आए वे हजूरिया कहलाए। जो तटस्थ थे वे बेचारे मजूरिया कहे गए। ये शब्दावली भी अखबारों की ही गढ़ी हुई थी।


अब  पत्रकार  सिंधिया भक्त  बेंगलुरू गये  20 विधायकों को 'हजूरिए' कहने लगे हैं। क्योंकि उन सबों के लिए ज्योतिरादित्य अभी भी  हजूर महाराज ही हैं। हजूरिए अभी भी बेंगलुरू में विक्ट्री का चिन्ह बनाए अपने महाराज के अगले  निर्देश का इंतजार कर रहे हैं। इधर कमलनाथ ने भोपाल से अपने भेदिए रवाना कर दिए हैं। उन्हें कवर फायर देने के लिए सोनिया गांधी ने कर्नाटक के चर्चित कांग्रेसी  डीके शिवकुमार को तैनात कर दिया है। अठारह साल कांग्रेस की झंडाबरदारी करने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। उस भाजपा में जिसकी संस्थापक सदस्यों में उनकी दादी श्रीमती विजयाराजे सिंधिया थीं. उस भाजपा में जिसमें उनकी बुआ वसुंधरा राजे तीन बार मुख्यमंत्री रहीं और दूसरी बुआ यशोधरा राजे प्रदेश भाजपा में वर्षों मंत्री..। वैसे भी माधवराव सिंधिया का राजनीतिक करियर 1971 में जनसंघ के सांसद के तौर पर शुरू होता है। इस दृष्टि से ज्योतिरादित्य के इस नए कदम को घर वापसी की तरह प्रचारित किया जा रहा है। ज्योतिरादित्य को भाजपा की राज्यसभा टिकट भी  हो चुकी है। 


इधर कांग्रेस पार्टी के विधायक जयपुर के लिए निकल लिए हैं। इनकी संख्या 84 से 100 तक बताई जा रही है। बेंगलुरू में सिंधिया खेमें के 20 हजूरिए विधायक हैं ही। भाजपा के 104 विधायक भी हवाई जहाज से दिल्ली पहुंच चुके हैं। वहां हरियाणा के एक सात सितारा होटल में उनका प्रबोधन चल रहा है। श्यामला हिल्स के सीएम बंगले में कांग्रेस विधायक दल की बैठक के बाद एक ट्विस्ट आया है। कमलनाथ का दावा है कि बहुमत उनके साथ है और वे सरकार को पाँच साल तक खींचेंगे। 'मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार अब नहीं बचेगी' लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता अधीररंजन चौधरी की इस स्वीकारोक्ति के बाद भी मध्यप्रदेश के कांग्रेस प्रबंधकों में सरकार के बने रहने को लेकर गजब का आत्मविश्वास दिख रहा है। राजनीति में माइंडगेम ही आखिरी अस्त्र है क्योंकि इससे ही बिटवीन्स द लाइन वाले लोग टिके रह सकते हैं। राजनीति और क्रिकेट को शायद इसीलिए लिए एक सा खेल माना जाता है। मध्यप्रदेश कांग्रेस सरकार के प्रबंधक इसी उम्मीद पर कायम हैं।


    ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे विंस्टन चर्चिल ने कहा था- "अच्छा पत्रकार वही होता है जो किसी घटना के होने से महीना भर पहले उसके होने की भविष्यवाणी कर दे और फिर अगले दो महीने तक यह बताता रहे  नहीं हुई"। आम तौर पर दुनिया की पत्रकारिता इसी फार्मूले पर चलती है। अब इसी फार्मूले को नजीर मानते हुए एक वरिष्ठ नेआँकलन किया हैं कि अब आगे क्या-क्या हो सकता है?
एक- ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होने और राज्यसभा की टिकट घोषित होने के बाद क्या बंगलुरू के हजूरिए महाराज के साथ टिके रहेंगे..? क्योंकि संदेश गया कि महराज का सध गया लेकिन अपना क्या..? फिर अपन तो कांग्रेस में महाराज के साथ थे हम क्यों पार्टी बदलें..। उनके समक्ष चौधरी राकेश और बालेंदु शुक्ल का उदाहरण रखा जाएगा। 


दो- विधानसभा अध्यक्ष  उन 20 विधायकों का इस्तीफा तब तक स्वीकार नहीं करेंगे जब तक कि वे व्यक्तिगत न मिलें..। स्पीकर की भूमिका अहं होगी। सत्र 16 मार्च से है, उस दिन राज्यपाल का अभिभाषण होगा। भाजपा अभिभाषण से पहले ही फ्लोर टेस्ट की माँग कर सकती है या फिर स्पीकर के खिलाफ अविश्वास ला सकती है। 


तीन- जब तक यह स्थिति साफ नहीं होती राज्यसभा चुनाव को लेकर असमंजस रहेगा। स्पीकर और राज्यपाल के बीच घनघोर टकराहट देखने को मिल सकती है और यह प्रकरण हाईकोर्ट, सुप्रीमकोर्ट जाएगा।


चार- कमलनाथ सरकार साम-दाम-दंड-भेद राजनीति के चारों नुस्खे अपनाएगी। हुजूरियों के घरवालों को साधेगी। पुराने मामले उघाड़ने या दफन करने का काम होगा। हनीटेप के कुछ और विजुअल्स मीडिया में आ सकते हैं। व्यापम, ई-टेंडरिंग व कुछ और मामले खोले जा सकते हैं।


पाँच- प्रदेश की नौकरशाही वेट एन्ड वाच का रुख अख्तियार कर सकती है। हवा का रूख देखकर कमलनाथ को ये नौकरशाह झटका भी दे सकते हैं?


छह- चंबल-ग्वालियर क्षेत्र से भाजपा नेताओं के बगावत के सुर सुनने को मिल सकते हैं। प्रभात क्षा,नरेन्द्र तोमर, जयभान सिंह पवैय्या का क्या रुख रहता है यह देखना होगा।


सात- भाजपा अभी राज्यसभा चुनाव की बात कर रही है.. लेकिन अंदर ही अंदर यह घमासान शुरू हो गया कि यदि भाजपा की सरकार बनती है तो मुख्यमंत्री कौन होगा.? शिवराजसिंह चौहान को रोकने के लिए जबरदस्त लामबंदी होगी.?


आठ- हजूरिए विधायकों का क्या होगा? क्या उन्हें कर्नाटक की तर्ज पर फिर से लड़वाया जाएगा। यदि ऐसा होता है तो उनका क्या होगा जो पिछले चुनाव में इनसे हारे थे.?कांग्रेस भाजपा के ऐसे लोगों को पाले में लाकर माहौल बनाएगी.।


नौ- कांग्रेस पूरी कोशिश करेगी कि हजूरिए टूटकर उनसे फिर मिलें, वह भाजपा के असंतुष्ट विधायकों पर भी डोरे डालेगी..। यह उसकी आखिरी कोशिश होगी। इस कोशिश में सफल नहीं हुई तो कमलनाथ अपने सभी विधायकों से विधानसभा सदस्यी का इस्तीफा दिलाकर मध्यावधि चुनाव के लिए कोशिश करेंगे। मध्यावधि हो न हो..इसके लिए स्पीकर, गवर्नर, हाईकोर्ट, चुनाव आयोग की अपनी-अपनी भूमिका होगी।
                  मध्यप्रदेश में जो हो रहा है उसकी कहानी कमलनाथ के सत्ता संभालते ही शुरू हो गयी थी, जहाँ सत्ता के तीन मजबूत केंद्र हो वहां टकराव होगा तो किसी एक को दरकना ही है। चुनाव में बीजेपी के निशाने पे सबसे ज्यादा सिंधिया थे, देखा जाए तो एक तरह से सिंधिया ने 2018  विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के लिए नेतृत्व किया था और सबसे ज्यादा 110 चुनावी सभा तथा 12 रोड शो किया था, वही कमलनाथ ने 68 चुनावी सभाओं को संबोधित किया था जिसे बाद में मुख्यमंत्री बनाया गया। 
कहा जाता है मध्यप्रदेश में सत्ता के तीसरा केंद्र दिग्गी राजा को कमलनाथ पसंद थे इसलिए ऐसा हुआ। पसंद होने का पुराना कारण ये है कि दिग्गी राजा और सिंधिया घराने में पुरानी होड़ रही है। 
इस होड़ की कहानी 202 साल पुरानी है. जब 1816 में, सिंधिया घराने के दौलतराव सिंधिया ने राघोगढ़ के राजा जयसिंह को युद्ध में हरा दिया था, राघोगढ़ को तब ग्वालियर राज के अधीन होना पड़ा था.
इसका हिसाब दिग्विजय सिंह ने 1993 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता और पूर्व केंद्रीय मंत्री माधव राव सिंधिया को मुख्यमंत्री पद की होड़ में परास्त करके बराबर कर दिया था.
दिग्गी राजा के 1993 से 2003 के बीच किये गए शासन को देखते हुए कांग्रेस उन्हें मुख्यमंत्री तो बनाती नही इसलिए शायद 2018 में दिग्गी राजा ने फिर से चाल चली और मुख़्यमंत्री के प्रबल दावेदार ज्योतिरादित्य सिंधिया को पद तक न पहुंचने के लिए अपना काम किया। कांग्रेस भी दोनों की पुरानी होड़ को देखते हुए तथा मध्यप्रदेश के कठिन रिजल्ट को भांपते हुए चतुर व्यापारी कमलनाथ को आगे कर दिया।  2019 का लोकसभा का चुनाव हार चुके महाराजा को आस थी कि कुछ मिलेगा, लेकिन इधर राज्यसभा का भी टिकट भी मिलना मुश्किल लग रहा था, उसमें भी अपनी पार्टी के चिरप्रतिद्वन्दी दिग्गी राजा से जोर आजमाइश करना पड़ता। आज जो स्थिति है उसमें बीजेपी ही महाराजा है, लेकिन जब तक कहानी का पटाक्षेप नहीं हो जाता कुछ कहना मुश्किल है क्योंकि कमलनाथ को कम आंकना जल्दीबाजी होगी । 
          दिग्विजय सिंह ने राज्यसभा का टिकिट ?
पिछले एक सप्ताह से प्रदेश में चल रहे राजनीतिक घटनाक्रम के मुख्य सूत्रधार माने जा रहे राघोगढ़ के राजा दिग्विजय सिंह ने विधानसभा जाकर राज्यसभा के लिये अपने नामंकन पत्र दाखिल कर दिए।दिग्विजय अपनी पत्नी अमृता सिंह और प्रदेश सरकार में कानून मंत्री पी सी शर्मा के साथ अचानक विधानसभा पहुंचे और उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर राज्यसभा के लिए अपना नामांकन कराया।
        दरअसल राज्यसभा सीट के लिये कांग्रेस ही छोड़ देने बाले ग्वालियर महाराज की बजह से कांग्रेस नेतृत्व सकते में है।मध्यप्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और कार्यालय के प्रभारी श्चंद्र प्रभाष शेखर के मुताविक शाम 7 बजे तक प्रदेश कांग्रेस के पास अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की ओर से इस संबंध कोई सूचना नही पहुंची है।किसी तरह का कोई संदेश दिग्विजय को प्रत्याशी बनाये जाने को लेकर नही आया है।
उधर दिग्विजय खेमे का कहना है कि राजा का टिकट पक्का है।कांग्रेस की जो एक सीट पक्की है उस पर राजा साहब ही राज्यसभा जाएंगे।
          कांग्रेस छोड़कर भाजपा की सदस्यता लेने बाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को केंद्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर के साथ विशेष विमान से भोपाल पहुंचे।भोपाल पहुंचने पर उनका शानदार स्वागत हुआ।वह एयरपोर्ट से अपने समर्थकों के साथ प्रदेश भाजपा कार्यालय पहुंचे।वहां उनका भव्य स्वागत हुआ।भाजपा ने सिंधिया को अपना राज्यसभा प्रत्याशी घोषित कर दिया है।
     उल्लेखनीय है कि सवा साल पुरानी कमलनाथ सरकार खतरे में पड़ गयी है।एक सप्ताह पहले खुद दिग्विजय ने यह आरोप लगाया था कि भाजपा कांग्रेस के विधायकों को 35 करोड़ का ऑफर दे रही है।मजे की बात यह है कि जिन 22 कांग्रेस विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता छोड़ी है उनमें दो दिग्विजय के पुराने समर्थक भी हैं।फिलहाल भोपाल में चुनावी तापमान इतना बढ़ गया है ।लेकिन जो नया वायरस जन्मा है वह कमलनाथ सरकार के लिये बहुत घातक माना जा रहा है।इससे मुकाबले के लिये कमलनाथ हर स्तर पर प्रयास कर रहे हैं।
* बुघवार बहुमाध्यम समुह