पत्रकारिता के लिए शर्मनाक दिन

पत्रकारिता के लिए शर्मनाक दिन
कृब्ण देव सिंह


रायपुर।मैं स्वंम छात्र जीवन से  ही व्याक्तिगत से जुडा रहा हूँ और कई आन्दोलनो का नेतृत्व भी सफलतापूर्वक किया है। इन्जीयरिग कालेज रायपुर के छात्रसंघ अध्यक्ष के नाते व इसके पूर्व अखिल भारतीय छात्र फेड़ेरशन केजिला व राष्ट्रीय परिषद के सदस्य के नाते कई आन्दोलनों का नेतृत्व किया है। छात्रनेता के नाते तो रायपुर तेलघानी नाका में ओवरब्रिज बनाने के लिये एक माह तक ऐतिहासिक जन आन्दोलन का नेतृत्व भी किया . पर कभी पत्रकारो के प्रति असम्मान भाव हमलोगों के मन में नही आया। फिर मै वर्ष 1985से सक्रिय रन्प से पत्रकारिता कर रहा हूँ।इस दौरान संयुक्त मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ में आयोजित होने वाले अनेक आन्दोलनों तथा विधानसभा की कार्यवाही व प्रदर्शनों का प्रत्यक्ष गबाह बना. लेकिन मैंने कभी भी नही देखा और न सुना कि आन्दोलनकारी पत्रकारों को इतनी बुरी तरह से वेइज्जत करके आन्दोलन की रिपोंटिंग करने से रोकने , आन्दोलन स्थल से पत्रकार को रोका व ह्टाया हो I जैसा गत दिनों दिल्ली के शाहीन बाग  में जाने माने वहुर्चाचित टीवी एंकर दिपक चौरसिया को रोका गया है।
    क्या पत्रकार फैसला कर सकता कि को३ि आन्दोलन की आड में षडयंत्र किया गया है।यदि शाहिन वाग का आन्दोलन षडयंत्र है तो केन्द्र और राज्य सरकार चुप क्यों है?केन्द्रीय जांच एजेन्सियों को किसने रोका है?षडयंत्र का यथाशीघ्र भंन्डाफोड़ होना ही चाहिए।यदि प्रमाण मिले तो समुचित कार्यवाही होनी ही चाहिए ।
            जिस तरह से दिल्ली के शाहीन बाग में पत्रकारों का   वहां के लोगों ने  बहिष्कार किया ,बायकॉट किया ,इनसे बात करने से इंकार कर इन्हें बैरंग वापस लौटाया उससे यही साबित होता है कि  वहां की जनता इन्हें पत्रकार के रूप में मान्यता नहीं देती  है और ना ही पत्रकार मानती है ।किसी न्यूज चैनल का ,अखबार का कोई भले ही सम्पादक हो जाये ,उसकसंवाददाता ,रिपोर्टर  बनकर पत्रकार हो जाये ,सरकार ,प्रशासन भी उसे पत्रकार मानने लगे ।लेकिन वह असल पत्रकार तभी माना जाता है जब जनता के बीच भी उसकी स्वीकार्यता एक पत्रकार के रूप में हो ।लोग जिसे पत्रकार के रूप में जानते हों ,मानते हों तो फिर उस पत्रकार के लिए यह जरूरी नहीं रहता कि वो किसी न्यूज चैनल का  अखबार   का अधिकृत प्रतिनिधि बने तभी उसे पत्रकार माना जायेगा । पत्रकार को तो मूल कार्य ही यह होता है कि वो जनता की बात शासन  और प्रशासन तक पहुंचाने के लिए एक विश्वसनीय माध्यम  (मीडिया )बने और जनता द्वारा स्वीकार्य पत्रकार स्वतंत्र रूप से   भी पत्रकारिता कर सकता है।
        मैं निज तौर पर मानता हूँ कि पत्रकारिता में पत्रकार शासन/ प्रशासन और जनता के मघ्य संवाद का जिवन्त माध्यम है। यही कारण है पत्रकार अपना आदर्श नारद जी को मानता हैI उन्हें सृष्टि का पहला पत्रकार माना जाता है। अगर पत्रकार एकपक्षीय आभिव्यक्ति अथवा स्तुति करने लगे तो वह पत्रकार कैसे हो सकता है ?वह तो चारण/ भाट है। मेरी निज मान्यता है कि यदि पत्रकार अपना स्वंम का आचरण व व्यवहार तभा लेखन की गरिमा को कायम रखता है तो वह हमेशा जनता द्वारा आदर और सम्मान का पात्र होता है । अब प्रिंट अथवा एलेक्ट्रोनिक मीडिया के पत्रकारो को सोचना व आत्ममंथन करना होगा कि वे कैसे पत्रकार बनना चाहते है,आदर पाने वाला अथवा दिल्ली के शाहिन बाग वाला?
* बुधवार मल्टीमीडिया नेटवर्क